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05. Isha Upanishad Verse 3

Content List असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥ असूर्याः अन्धेन तमसा आवृताः नाम ते लोकाः सन्ति । ये के च जनाः आत्महनः सन्ति ते प्रेत्य तान् अभिगछति॥ वे सभी लोग अपनी आत्मा का हनन करने के कारणवश यहां से प्रयाण करने पर ऐसे लोक पहुंचते हैं जो कि सूर्य से रहित हैं और गाढ़े अन्धकार से आच्छादित हैं। All such people having sullied their souls move to un-illumined regions, that are drenched in darkness.

04. Isha Upanishad Verse 2

Contents List कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥ कुर्वन्न् एवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतॅं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽ अस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥ इस जीवन काल में अपना जीवन कर्मों को किसी पर ईर्षा या मन लगाने से खुद को वर्जित रखते हुए व्यतीत करना चाहिए, जीना चाहिये। इससे कर्म के विपरीत परिणाम का संचय या ज़मा नहीं होता है। इस कारण स्वरूप उनके विपरीत फल प्राप्ती नहीं होती है। इस तरह से इंसान को सौ साल जीना चाहिये। हमें इस प्रकार का विधान मान्य करना चाहिते। इस तरह से जीने से कोई कर्म का संचय नहीं होता है। One needs to commit oneself to spend his life, living in a way keeping free of jealousy, envy, hate on such like feelings / orientations. This ensures non accumulation of opposite results of karma. One should live his or her life for a hundred years in this manner. It is then  rewarded by liberation.

03. Isha Upanishad Verse 1

Contents List ॐ ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।  तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥ ॐ ईशावास्यम्‌ इदँ सर्वं, यत्किञ्च जगत्यां जगत्।  तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाऽ मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ ईश के अनेक अर्थ हैं। देव, ईश्वर, परमात्मा इन और अन्य नामों से समझा, जाना और संबोधा ज़ाया है। जो भी विश्व में है, स्थित है,  वास्तविकता से पूर्ण है, इनमें ईश स्थित है। इतना ही नहीं, यह ईश स्वरूप है और ईश से भिन्न नहीं है।  इस पार्श्वभूमि को मध्य नज़र रखते हुए इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार व्यक्त होता है। ज़ो भी वास्तविकता हमारे समक्ष पेश होती है, हमें पेश आती है, हमारे सहित भी, वह पूर्ण है, इतना ही नहीं, परिपूर्ण है। इस बात को सही ढंग से जानते हुए, कोई या किसी भी व्यक्ति के प्रति लोभ, ईर्शा, ज़लन या डाह से रहित रहना चाहिये।  इस विचार को ध्यान में रखते हुए अब यह सरल अर्थ : जो भी वास्तविकता से हमारा संबंध आता है, वह ईश से परिपूर्ण ही नहीं ईश ही है। इस बात को अच्छी तरह से समझते हुए किसी भी व्यक्ति के प्रति लोभ, ईर्शा, ज़लन या डाह लगाने से खुद को वर्जित रखना चाहिये।...

02. Isha Upanishad - Invocation

Contents List  02. Isha Upanishad - Invocation Isha Upanishad -  ईषा उपनिषद ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ पूर्णंम् अद: पूर्णंम् इदं पूर्णात् पूर्णंम् उदच्यते| पूर्णस्य पूर्ण-मादाय पूर्णंम् एवं वशिष्यते|| ओम्! --  यह विश्व अविभाज्य एक है, पूर्ण है, दोष रहित है, कोख जैसा है। इसका मूल गुण नये को जन्म देना और उसका पोषण करना है।  नाश होना, नष्ट होना, मृत्यु को प्राप्त होना इस प्रक्रिया का अंग है, प्रासंगिक घटना है। इस कारण वश पूर्णता अनादि काल से, अनादि काल तक पूर्ण की पूर्ण रहती है। इस वजह से इस पूर्ण को समझने के लिये मानवता ने ईश्वर, देव, परमात्मा ऐसे शब्दों का उपयोग किया है। इस विचार को ध्यान में रखते हुए अब यह सरल अर्थ : यह पूर्ण है, वह पूर्ण है। उस पूर्ण से इस पूर्ण की उत्पत्ती होने पर वह पूर्ण, शेष पूर्ण रहता है। - ओम्! शांति! शांति! शांति! Om!  -- This universe is one indivisible, complete, flawless, womb-like whole.  Its basic quality is to give birth to the new and nurture it.  Destructio...

01. Isha Upanishad - Salag - Full Text

Contents List  01. Isha Upanishad - Salag - Full Text Isha Upanishad -  ईषा उपनिषद ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।  तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः ।  एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥ असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।  ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥ तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।  तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥ यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।  सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।  तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥ स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥ अन्धं तमः प्रविशन्त...

00. Table Of Contents

 Table of Contents 01.  Isha Upanishad - Salag / Full Text 02. Isha Upanishad -Invocation 03. Isha Upanishad - Verse 1