04. Isha Upanishad Verse 2


कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

कुर्वन्न् एवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतॅं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽ अस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

इस जीवन काल में अपना जीवन कर्मों को किसी पर ईर्षा या मन लगाने से खुद को वर्जित रखते हुए व्यतीत करना चाहिए, जीना चाहिये। इससे कर्म के विपरीत परिणाम का संचय या ज़मा नहीं होता है। इस कारण स्वरूप उनके विपरीत फल प्राप्ती नहीं होती है। इस तरह से इंसान को सौ साल जीना चाहिये। हमें इस प्रकार का विधान मान्य करना चाहिते। इस तरह से जीने से कोई कर्म का संचय नहीं होता है।

One needs to commit oneself to spend his life, living in a way keeping free of jealousy, envy, hate on such like feelings / orientations. This ensures non accumulation of opposite results of karma. One should live his or her life for a hundred years in this manner. It is then  rewarded by liberation.

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